सहज योग आज का महायोग, कैसे करें ध्यान
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मैने कई बार देखा है कि ध्यान करते समय अगर कोई चक्र पकड़ता है तो लोगों का ध्यान वहीँ लगा रहता है, अब आपको बिलकुल भी चिंता नहीं करनी है, आप उसे जाने दीजिये और वह अपने आप कार्य करेगा। आपको कोई kriya नहीं करनी है, यही है ध्यान। ध्यान का मतलब है स्वयं को भगवान की कृपा पर छोड़ देना। यही कृपा जानती है कि आपको किस तरह से ठीक करना है, इसे ज्ञान है कि आपको किस तरह सुधारना है। आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है कि आप को क्या करना है। कौन से मन्त्र का उच्चारण करना है। आपको ध्यान में पूर्ण निष्कृय रहना है।
 
   
 हो सकता है आप निर्विचार न हों, ऐसी दशा में आप विचारों पर नजर रखें, उनमें उलझे नहीं। आप देखेगें जैसे-जैसेसूरज उगता है वैसे-वैसे अधेंरा चला जाता है और सूरज की किरणें हर एक कोने तक पहुंचती हैं और सारी जगह को प्रकाशित कर देतीं हैं। उसी तरह से आप भी प्रकाशित हो जायेंगे । 
 अपने अन्दर की कुछ चीजों को रोकने की कोशिश करेंगे या फिर बन्धन देगें तो वह नहीं होगा । निष्कृयता ही सही ध्यान करने का एक तरीका है। पर आपको इसके प्रति जड़वत भी नहीं होना चाहिए, आपको सतर्क होना चाहिये और नजर रखनी चाहिए। दूसरी ओर हो सकता है कि लोग झपक जाये ।..... अगर आप झपक जायं तो कुछ भी कार्यान्वित नहीं होगा। यह उसका दूसरा पहलू है। ... एकदम सचेत पर सम्पूर्ण निष्कृय , पूर्णतः निष्कृय होना चाहिए। सूर्य की किरणों की तरह परम चैतन्य शक्ति कार्य करने लगती है। 
 
 
 वास्तव मे जब आप कृया करते हैं तब इसकी राह मे बाधा डालते हैं, इसलिए आपको कोई भी प्रयास करने कि जरूरत नहीं है। एकदम निष्कृय रहिए। कोई मन्त्र नहीं बोलना है, अगर ऐसा करना आपके लिए मुश्किल है तो फिर आप मेरा नाम ले सकते हैं, पर इसकी भी कोई जरूरत नहीं है। जब आप अपना हाथ मेरी ओर करते हैं, वही मन्त्र है, यह चेष्ठा ही अपने आप मे एक मन्त्र है। मन मे इच्छा के साथ भावना भी होनी चाहिये। अब हमनें हाथ फैला दिए हैं और यह कार्यान्वित होने वाला है। जब यह भावना अन्दर से, गहराई से होगी तो कोई भी मन्त्र बोलने की जरूरत नहीं, अब आप उससे परे हैं।
   
 
निर्विचारिता के लिये किसी के उपर अपना चित्त केन्द्रित नहीं करना है, पर सिर्फ उसे ग्रहण करना है। किसी समस्या के बारे में मत सोचिए, सिर्फ इतना सोचे कि आपको निष्कृय होना है।पूर्णतया निष्कृय।
निष्कृयता ही चाभी है।

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