नेता विरोधी दल की नियुक्ति पर विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल आमने सामने
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यूपी विधानसभा में नेता विरोधी दल की नियुक्ति पर विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल आमने सामने आ गए हैं. राज्यपाल ने मंगलवार को नेता विरोधी दल के पद पर रामगोविंद चौधरी की नियुक्ति के तरीके पर ऐतराज जताया था. जिस पर निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने इस नियुक्ति को आज सही ठहराया है.

श्री पांडेय ने बुधवार को कहा की भारतीय संविधान के अनुच्छेद -179, के खण्ड-क, के अन्तर्गत अंतिम प्रस्तर में यह प्राविधान किया गया है कि जब कभी विधान सभा का विघटन किया जाता है तो विघटन के पश्चात् होने वाले विधान सभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा। संविधान की मंशा के अनुसार विधान सभा का अध्यक्ष तब तक अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन कर सकेगा, जब तक कि नये अध्यक्ष का चुनाव न हो जाय। चुनाव सम्पन्न होने के बाद और नये अध्यक्ष के आसान ग्रहण करने के बाद पूर्व अध्यक्ष के अधिकार समाप्त हो जाते है।

श्री पांडेय के मुताबिक इन्हीं अधिकारों के अधीन 2007 और 2012 एवं विगत दो दशकों से निवर्तमान मा0 अध्यक्ष द्वारा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अधीन नेता विरोधी दल के लिए पार्टी से प्राप्त प्रस्ताव पर यथाविधि विचार करते हुए नेता विरोधी दल के पद पर तैनाती के लिए निर्देश दिये गये थे। यह व्यवस्था परम्परागत एवं नियमानुकूल है।  पूर्व में प्रचलित परम्पराओं के अनुरूप ही वर्तमान मा0 अध्यक्ष जो कि संविधान के अनुच्छेद-179 के अन्तर्गत नये अध्यक्ष के चुनाव होने तक सभी कार्यो को सम्पादित करने के लिए अधिकृत है, के द्वारा यथाविधि नेता विरोधी दल के चयन के बारे में निर्देश दिये गये। यह परम्परा दशकों से प्रचलित है।

राज्यपाल को क्या था ऐतराज 

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नेता विरोधी दल के रूप में श्री राम गोविन्द चैधरी को मान्यता दिये जाने के तौर तरीके पर ऐतराज जताया था.  श्री नाईक ने एक पत्र लिख कर इस मनोनयन पर विचार करने को कहा था. आपको बता दें समाजवादी पार्टी ने सोमवार को श्री chaudhari को विधान सभा में नेता चुना था. जिसके बाद निवर्तमान विधानसभ अध्यक्ष की और से उन्हें बतौर नेता विरोधी दल चुने जाने कि सूचना जारी की  गयी थी.   

श्री नाइक ने इस संबंध में भारत के संविधान के अनुच्छेद 175(2) अतंर्गत नवगठित विधान सभा के विचारार्थ संदेश भेजा था. राजभवन द्वारा भेजे गये संदेश में कहा गया कि नवगठित विधान सभा, निवर्तमान विधान सभा अध्यक्ष द्वारा 16वीं विधान सभा के अंतिम कार्यदिवस दिनांक 27 मार्च, 2017 को नवगठित 17वीं विधान सभा के लिए श्री राम गोविन्द चैधरी, सदस्य विधान सभा एवं नेता समाजवादी पार्टी, विधान मंडल दल को दिनांक 27 मार्च, 2017 से नेता विरोधी दल के रूप में अभिज्ञात करने हेतु लिए गए निर्णय/अधिसूचना दिनांक 27 मार्च, 2017 के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक औचित्य (democratic and constitutional propriety) के प्रश्न पर विचार करे।

राजभवन की ओर से भेजे गये पत्र में कहा गया था  कि विधान सभा के सामान्य निर्वाचन के फलस्वरूप नवगठित विधान सभा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा ही नवगठित विधान सभा में नेता विपक्ष को अभिज्ञात करने की हमेशा परम्परा रही है। नेता विरोधी दल को अभिज्ञात करने का कदाचित कोई अन्य उदाहरण देश के किसी राज्य में उपलब्ध नहीं है जब किसी विधान सभा के कार्यकाल के अंतिम दिवस पर विधान सभा अध्यक्ष द्वारा नवगठित अथवा आने वाली नई विधान सभा, जिसका कि विधान सभा अध्यक्ष सदस्य भी निर्वाचित नहीं हो सका हो, अगले पाॅंच वर्ष के लिए नेता विपक्ष को अभिज्ञात किया गया हो। 

पत्र में यह भी कहा गया था कि दीर्घ समय से देश के समस्त राज्यों की विधान सभाओं में नेता विपक्ष के चयन/अभिज्ञान के संबंध में चली आ रही स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का अनुपालन उत्तर प्रदेश की नवगठित 17वीं विधान सभा के नेता विपक्ष के चयन अथवा अभिज्ञान के प्रकरण में क्यों नहीं किया गया, यह उत्तर प्रदेश विधान सभा सचिवालय द्वारा निर्गत उपरोक्त अधिसूचना दिनांक 27 मार्च, 2017 से स्पष्ट नहीं होता है। विधान सभा में नेता विरोधी दल को अभिज्ञात करना अथवा नहीं करना विधान सभा अध्यक्ष का विवेकाधिकार है न कि संवैधानिक बाध्यता। राजभवन की ओर से भेजे गये पत्र में यह भी कहा गया है कि 27 मार्च को जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट नहीं है कि नेता विपक्ष के चयन का मामला यदि नवगठित विधान सभा के नये अध्यक्ष पर छोड़ा गया होता तो किस प्रकार की संवैधानिक शून्यता अथवा संकट (constitutional void or crisis) अथवा असंवैधानिकता (unconstitutionality) उत्पन्न होने की संभावना थी। 

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